Class-12 Economics
Chapter- 4 (पूर्ण
प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत)
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न:
प्रश्न 1.
वस्तु की माँग मात्रा में वृद्धि होने पर तथा उसी वस्तु की पूर्ति
मात्रा में कमी होने पर संतुलन कीमत पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
संतुलन कीमत में वृद्धि होगी।
प्रश्न 2.
साम्य (या संतुलन) कीमत की परिभाषा दीजिये।
उत्तर:
बाजार माँग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित कीमत साम्य
कीमत कहलाती है।
प्रश्न 3.
आगम को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
फर्म द्वारा उत्पादन बेचने से प्राप्त राशि आगम कहलाती है।
प्रश्न 4.
पूर्ति से क्या आशय है?
उत्तर:
बाजार में किसी निर्धारित समय पर विभिन्न कीमतों पर बिकने हेतु
प्रस्तुत मात्रा पूर्ति कहलाती है।
प्रश्न 5.
बाजार पूर्ति क्या है?
उत्तर:
बाजार में सभी फर्मों द्वारा विभिन्न कीमतों पर बेचे जाने वाली
मात्रा।
प्रश्न 6.
पूर्ति वक्र के दायीं ओर खिसकने का एक कारण बताओ।
उत्तर:
प्रौद्योगिकीय प्रगति।
प्रश्न 7.
व्यक्तिगत फर्मों के पूर्ति वक्रों को समूहित करके कौनसा पूर्ति
वक्र प्राप्त किया जाता है?
उत्तर:
बाजार पूर्ति वक्र।
प्रश्न 8.
एक फर्म द्वारा वस्तुओं के उत्पादन तथा विक्रय करने के पीछे सबसे
महत्त्वपूर्ण उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
लाभ को अधिकतम करना।
प्रश्न 9.
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में सभी फर्मे किस प्रकार की वस्तुओं का विक्रय
करती हैं?
उत्तर:
समरूप वस्तुएँ।
प्रश्न 10.
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में एक फर्म कीमत स्वीकारक होती है अथवा कीमत
निर्धारक होती है?
उत्तर:
कीमत स्वीकारक।
प्रश्न 11.
पूर्ण प्रतिस्पर्धा बाजार की कोई एक विशेषता बताइए।
उत्तर:
बाजार में प्रत्येक फर्म समान कीमत लेती है।
प्रश्न 12.
एक फर्म के कुल संप्राप्ति वक्र का द्वाल किस प्रकार का होता है?
उत्तर:
धनात्मक ढाल।
प्रश्न 13.
यदि फर्म का निर्गत शून्य हो तो कुल संप्राप्ति कितनी होगी?
उत्तर:
शून्य।
प्रश्न 14.
लाभ ज्ञात करने का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
लाभ = कुल संप्राप्ति - कुल लागत
प्रश्न 15.
कुल संप्राप्ति से आपका क्या अभिप्राय
उत्तर:
एक फर्म द्वारा बाजार कीमत पर अपना उत्पादन बेचने से प्राप्त धन को
कुल संप्राप्ति कहा जाता
प्रश्न 16.
कुल संप्राप्ति वक्र क्या है?
उत्तर:
एक फर्म का कल संप्राप्ति वक्र इसकी कुल संप्राप्ति तथा इसके निर्गत
के बीच सम्बन्ध दर्शाती है।
प्रश्न 17.
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में एक फर्म की कीमत रेखा तथा माँग वक्र में
क्या सम्बन्ध होता है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में एक फर्म की कीमत रेखा तथा माँग वक्र एक ही
होता है।
प्रश्न 18.
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में एक फर्म का माँग वक्र कैसा होता है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतिस्पर्धा बाजार में एक फर्म का माँग वक्र पूर्णतया लोचदार
होता है।
प्रश्न 19.
औसत संप्राप्ति का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कुल संप्राप्ति में निर्गत की मात्रा का भाग देने से प्राप्त
संप्राप्ति को औसत संप्राप्ति कहते हैं।
प्रश्न 20.
सीमान्त संप्राप्ति को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
यह फर्म के निर्गत में प्रति इकाई वृद्धि के लिए कुल संप्राप्ति
वृद्धि के रूप में परिभाषित की जाती
प्रश्न 21.
एक फर्म द्वारा लाभ अधिकतम होने हेतु पूरी होने वाली कोई दो शर्ते
बताइए।
उत्तर:
·
बाजार कीमत
सीमान्त लागत के बराबर होनी चाहिए।
·
सीमान्त
लागत ह्रासमान नहीं होनी चाहिए।
प्रश्न 22.
सामान्य लाभ से आपका क्या अभिप्राय
उत्तर:
वह लाभ स्तर जो केवल स्पष्ट लागतों तथा अवसर लागतों को पूरा कर सके।
प्रश्न 23.
अधिसामान्य लाभ किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह लाभ जो एक फर्म सामान्य लाभ से ऊपर अर्जित करती है।
प्रश्न 24.
लाभ - अलाभ बिन्दु किसे कहते हैं?
उत्तर:
पूर्ति वक्र के जिस बिन्दु पर एक फर्म साधारण लाभ अर्जित करती है।
प्रश्न 25.
अवसर लागत किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी कार्य की अवसर लागत दूसरे सर्वश्रेष्ठ कार्य से प्राप्त त्यागा
गया लाभ है।
प्रश्न 26.
फर्म के पूर्ति वक्र के कोई दो निर्धारक तत्त्वों के नाम लिखिए।
उत्तर:
·
प्रौद्योगिकीय
प्रगति
·
आगत
कीमतें।
प्रश्न 27.
इकाई कर किसे कहते हैं?
उत्तर:
इकाई कर वह कर है जो सरकार निर्गत के प्रति इकाई विक्रय पर लगाती
है।
प्रश्न 28.
जब पूर्ति वक्र ऊर्ध्वस्तरीय होता है, तो
पूर्ति की कीमत लोच क्या होगी?
उत्तर:
जब पूर्ति वक्र ऊर्ध्वस्तरीय होता है, तो
पूर्ति की कीमत लोच शून्य होगी।
प्रश्न 29.
उत्पादन आगतों की कीमतों में कमी होने पर फर्म के पूर्ति वक्र पर
क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
उत्पादन आगों की कीमतों में कमी आने पर पूर्ति वक्र दाहिनी तरफ
शिफ्ट हो जाता है।
प्रश्न 30.
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में एक फर्म का सीमान्त संप्राप्ति वक्र किस
प्रकार का होता है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में एक फर्म का सीमान्त संप्राप्ति वक्र क्षैतिज
अक्ष के समानान्तर होता है।
प्रश्न 31.
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में एक फर्म का औसत संप्राप्ति वक्र कैसा होता
है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में एक फर्म का औसत संप्राप्ति वक्त क्षैतिज
अक्ष के समानान्तर होता है।
प्रश्न 32.
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में कीमत, औसत संप्राप्ति
तथा सीमान्त संप्राप्ति में क्या सम्बन्ध होता है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में कीमत, औसत संप्राप्ति
तथा सीमान्त संप्राप्ति तीनों समान होते हैं।
प्रश्न 33.
उत्पादन कर में वृद्धि होने पर पूर्ति वक्र किस तरफ शिफ्ट होता है?
उत्तर:
उत्पादन कर में वृद्धि होने पर पूर्ति वक्र बायीं तरफ शिफ्ट हो जाता
है।
प्रश्न 34.
फर्मों की संख्या में कमी होने पर पूर्ति वक्र पर क्या प्रभाव
पड़ेगा?
उत्तर:
फर्मों की संख्या में कमी होने पर पूर्ति वक्र बायीं तरफ शिफ्ट हो
जाएगा।
प्रश्न 35.
जब पूर्ति वक्र मूल बिन्दु से होकर गुजरता है तो पूर्ति की लोच
कितनी होगी?
उत्तर:
जब पूर्ति वक्र मूल बिन्दु से होकर गुजरता है तो पूर्ति की लोच इकाई
के बराबर होगी।
प्रश्न 36.
पूर्ति लोचदार कब होगी?
उत्तर:
जब कीमत में होने वाले परिवर्तन के अनुपात की तुलना में पूर्ति में
अधिक परिवर्तन होता है।
प्रश्न 37.
पूर्ति बेलोचदार कब होती है?
उत्तर:
जब कीमत में होने वाले परिवर्तन के अनुपात की तुलना में पूर्ति में
कम परिवर्तन होता है।
प्रश्न 38.
पूर्णतया बेलोचदार पूर्ति कब होती है?
उत्तर:
जब कीमत में परिवर्तन होने से पूर्ति में कोई परिवर्तन नहीं होता है,
तो पूर्ति पूर्णतया बेलोचदार होती
प्रश्न 39.
इकाई लोचदार पूर्ति किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब वस्तु की पूर्ति में उसी अनुपात में परिवर्तन होता है, जिस अनुपात में वस्तु की कीमत में परिवर्तन होता है।
प्रश्न 40.
पूर्ति वक्र का स्वरूप कैसा होता है?
उत्तर:
पूर्ति वक्र सामान्यतः बाई से दायीं तरफ ऊपर उठता हुआ होता है।
प्रश्न 41.
पूर्णतया बेलोचदार पूर्ति में पूर्ति वक्र कैसा होता है?
उत्तर:
पूर्णतया बेलोचदार पूर्ति में पूर्ति वक्र लम्बवत् अक्ष के
समानान्तर होता है।
प्रश्न 42.
एक फर्म के कुल संप्राप्ति वक्र की आकृति कैसी होती है?
उत्तर:
यह उद्गम से धनात्मक ढाल वाला वक्र होता है।
लघूत्तरात्मक प्रश्न:
प्रश्न 1.
बाजार पूर्ति को एक तालिका के माध्यम से समझाइये।
उत्तर:
बाजार पूर्ति में वस्तु की कीमत एवं पूर्ति की मात्रा में धनात्मक
सम्बन्ध पाया जाता है जिसे निम्न तालिका से स्पष्ट किया जा सकता है।
|
वस्तु
की कीमत |
पूर्ति
की मात्रा |
|
1 2 3 4 |
2 4 7 9 |
प्रश्न 2.
पूर्ण प्रतिस्पर्धात्मक बाजार के कोई दो लक्षण लिखिए।
उत्तर:
1.
इसमें
बाजार में अनेक क्रेता एवं विक्रेता होते हैं।
2.
इसमें
बाजार में समान कीमत पर समरूप वस्तुओं का विक्रय किया जाता है।
प्रश्न 3.
यदि माँग और पूर्ति दोनों में कमी हो तो -संतुलन कीमत पर क्या
प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
यदि मांग एवं पूर्ति में समान कमी हो तो कीमत स्थिर रहेगी, यदि मांग पूर्ति की तुलना में अधिक कम हो तो कीमत में कमी होगी तथा यदि
पूर्ति मांग की तुलना में अधिक कम हो तो कीमत में वृद्धि होगी।
प्रश्न 4.
उत्पादक के संतुलन की कोई दो सामान्य शर्त बताइए।
उत्तर:
1.
बाजार
कीमत, सीमान्त लागत के बराबर हो।
2.
सीमान्त
लागत हासमान नहीं हो।
प्रश्न 5.
पूर्ति वक्र क्या है? इसका ढाल कैसा होता है?
उत्तर:
वह वक्र जो किसी निर्धारित समय पर कीमत तथा पूर्ति की मात्रा के
सम्बन्ध को दर्शाता है। सामान्यतः पूर्ति वक्र ऊपर की ओर उठा हुआ होता है।
प्रश्न 6.
संतुलन कीमत से आप क्या समझते हैं? यह कैसे
निर्धारित होती है? ।
उत्तर:
संतुलन कीमत वह है जो बाजार माँग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा
निर्धारित होती है। यह वहाँ निर्धारित होती है जहाँ बाजार माँग एवं पूर्ति दोनों
बराबर होती हैं।
प्रश्न 7.
तकनीकी प्रगति का वस्तु की पूर्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
तकनीकी प्रगति के फलस्वरूप कम लागत पर अधिक उत्पादन संभव हो पाता है
अत: वस्तु की पूर्ति बढ़ जाएगी एवं पूर्ति वक्र दाहिनी ओर शिफ्ट हो जाएगा।
प्रश्न 8.
यदि साइकिलों का उत्पादन करने वाली फर्म के लिए सरकार उत्पादन शुल्क
बढ़ा देती है, तो साइकिलों की पूर्ति पर दीर्घकाल में क्या
प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
उत्पादन शुल्क बढ़ाने से साइकिलों की उत्पादन लागत बढ़ जाएगी जिससे
दीर्घकाल में साइकिलों की पूर्ति कम हो जाएगी।
प्रश्न 9.
यदि जूते के उत्पादन पर सरकार उत्पादन शुल्क घटा दे, तो जूते की पूर्ति पर अल्पकाल में क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
अल्पकाल में उत्पादन शुल्क घटाने पर कुछ सीमा तक परिवर्तनशील साधनों
की मात्रा बढ़ाकर जूतों की थोड़ी पूर्ति बढ़ाई जा सकती है।
प्रश्न 10.
पूर्ति का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अन्य बातें समान रहने पर वस्तु की पूर्ति वह मात्रा है जो एक बाजार
में किसी निर्धारित समय पर विभिन्न कीमतों पर विक्रय के लिए प्रस्तुत की जाती है।
प्रश्न 11.
पूर्ति के नियम का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
पूर्ति के नियम के अनुसार अन्य बातें समान रहने पर कीमत बढ़ने पर
वस्तु की पूर्ति बढ़ती है तथा वस्तु की कीमत घटने पर पूर्ति घटती है।
प्रश्न 12.
बाजार पूर्ति वक्र किसे कहते हैं?
उत्तर:
बाजार पूर्ति वक्र वह निर्गत स्तर दर्शाता है जिसका बाजार में सभी
फमैं समवर्ती विभिन्न बाजार मूल्यों पर सामूहिक रूप से उत्पादन करती हैं।
प्रश्न 13.
इकाई कर क्या है? इसके लगाने से पूर्ति पर
क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
इकाई कर वह कर होता है, जो सरकार निर्गत के
प्रति इकाई विक्रय पर लगाती है। इकाई कर लगाने से लागत में वृद्धि होती है जिससे
पूर्ति की मात्रा कम हो जाती है।
प्रश्न 14.
उत्पादन बन्दी बिन्दु क्या है? अल्पकाल में एक
फर्म कब उत्पादन बन्द कर देती है?
उत्तर:
उत्पादन बन्दी बिन्दु उत्पादन का वह स्तर है जिस पर फर्म उत्पादन
बन्द कर देती है। यदि अल्पकाल में फर्म को औसत परिवर्ती लागत भी प्राप्त नहीं होती
तो वह उत्पादन बन्द कर देती है।
प्रश्न 15.
पूर्ति में विस्तार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अन्य बातें समान रहने पर वस्तु की कीमत में वृद्धि होने से जब
उत्पादक अधिक मात्रा की पूर्ति करते हैं तो इसे पूर्ति में विस्तार कहते हैं।
प्रश्न 16.
पूर्ति में संकुचन से आप क्या समझते
उत्तर:
अन्य बातें समान रहने पर वस्तु की कीमत में कमी होने पर जब उत्पादक
वस्तु की कम मात्रा की पूर्ति करते हैं तो इसे पूर्ति में संकुचन कहते हैं।
प्रश्न 17.
पूर्ति में वृद्धि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
कीमत के स्थिर रहने पर जब किसी अन्य तत्त्व में परिवर्तन होने के
फलस्वरूप पूर्ति मात्रा बढ़ जाती है तो इसे पूर्ति में वृद्धि कहते हैं।
प्रश्न 18.
पूर्ति में कमी का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
कीमत के स्थिर रहने पर जब किसी अन्य तत्त्व में परिवर्तन होने के
फलस्वरूप पूर्ति मात्रा कम हो जाती है तो इसे पूर्ति में कमी कहते हैं।
प्रश्न 19.
आगतों की कीमतों में परिवर्तन का वस्तु की पूर्ति पर क्या प्रभाव
पड़ता है?
उत्तर:
आगतों की कीमतों का वस्तु की पूर्ति पर प्रभाव पड़ता है। आगतों की
कीमतों में वृद्धि होने पर वस्तु की पूर्ति में कमी एवं आगतों की कीमतों में कमी
होने पर वस्तु की पूर्ति में वृद्धि होती है।
प्रश्न 20.
कीमत रेखा क्या है? पूर्ण प्रतियोगिता में
फर्म की कीमत रेखा कैसी होती है?
उत्तर:
कीमत रेखा, वह रेखा होती है जो कीमत एवं फर्म
के निर्गत के मध्य सम्बन्ध दर्शाती है। पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत रेखा क्षैतिज
अक्ष के समानान्तर होती है।
प्रश्न 21.
पूर्ति को प्रभावित करने वाले कोई दो तत्त्व बताइए।
उत्तर:
1.
किसी
वस्तु की पूर्ति उस वस्तु की कीमत पर निर्भर करती है।
2.
वस्तु
की पूर्ति उत्पादन साधनों की कीमत पर निर्भर करती है।
प्रश्न 22.
पूर्ति के नियम की कोई दो मान्यताएँ बताइए।
उत्तर:
1.
उत्पादन
साधनों की कीमतों में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए।
2.
उत्पादन
की तकनीक में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए।
प्रश्न 23.
पूर्ति में वृद्धि के कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:
1.
यदि
उत्पादन की तकनीक में सुधार हो तो पूर्ति में वृद्धि होगी।
2.
यदि
बाजार में फर्मों की संख्या में वृद्धि होती है तो पूर्ति में वृद्धि होती है।
प्रश्न 24.
साम्य कीमत तथा साम्य मात्रा का क्या अर्थ है?
उत्तर:
माँग एवं पूर्ति के साम्य बिन्दु पर पाई जाने वाली कीमत साम्य कीमत
कहलाती है तथा माँग एवं पूर्ति के साम्य बिन्दु पर पाई जाने वाली मात्रा साम्य
मात्रा कहलाती है।
प्रश्न 25.
क्या पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म कीमत का निर्धारण करती है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म कीमत स्वीकारक होती है तथा कीमत बाजार
की मांग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित होती है।
प्रश्न 26.
पूर्ति वक्र क्या है? एक फर्म के पूर्ति चक्र
को निर्धारित करने वाले कोई तीन तत्त्व सुझाइए।
उत्तर:
पूर्ति वक्र: एक फर्म का पूर्ति वक्र निर्गत के स्तरों को दर्शाता
है जिनका संबंधित फर्म बाजार कीमत के विभिन्न मूल्यों पर उत्पादन के लिए चयन करती
है।
पूर्ति वन के निर्धारक तत्त्व - पूर्ति वक्र के प्रमुख: निर्धारक
तत्त्व निम्न प्रकार हैं।
1.
प्रौद्योगिकी
प्रगति
2.
आगत
कीमतें
3.
इकाई
कर।
प्रश्न 27.
पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में फर्मों के निर्बाध प्रवेश तथा
बहिर्गमन की मान्यता का प्रभाव लिखिए।
उत्तर:
पूर्ण प्रतिस्पर्धा के तहत कोई भी फर्म उद्योग में प्रवेश करने एवं
उद्योग से बाहर जाने हेतु स्वतंत्र रहती है, इसके
परिणामस्वरूप बाजार में अनेक फर्मे रहती हैं जिनमें पूर्ण प्रतिस्पर्धा बनी रहती
है तथा जिससे कीमत स्थिर बनी रहती है।
प्रश्न 28.
एक कीमत स्वीकारक फर्म की बाजार कीमत और सीमान्त सम्प्राप्ति में
क्या सम्बन्ध है? सारणी की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता में अल्पकाल में केवल परिवर्तनशील साधनों में
परिवर्तन किया जा सकता है। अल्पकाल में उद्योग के अन्तर्गत फर्म को असामान्य लाभ,
सामान्य लाभ अथवा हानि की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
दीर्घकाल में पूर्ण प्रतियोगिता में उद्योग की फर्म को सामान्य लाभ की प्राप्ति
होती है।
प्रश्न 29.
एक पूर्ण प्रतिस्पर्धात्मक बाजार के कोई चार पारिभाषिक लक्षण बताइए।
उत्तर:
1.
बाजार
में बड़ी संख्या में क्रेता एवं विक्रेता होते हैं।
2.
प्रत्येक
फर्म एकरूप वस्तु का उत्पादन एवं विक्रय करती है।
3.
फर्मों
का बाजार में स्वतन्त्र प्रवेश एवं बहिर्गमन होता है।
4.
फर्मों
व उपभोक्ता की बाजार जानकारी पूर्ण होती है।
प्रश्न 30.
कुल संप्राप्ति का क्या अभिप्राय है? इसे कैसे
मापा जाता है?
उत्तर:
कुल संप्राप्ति: एक फर्म के द्वारा बाजार में बाजार कीमत पर अपने
उत्पाद को बेचने से जो धन प्राप्त होता है, उसे कुल
संप्राप्ति कहते हैं। इसे वस्तु के बाजार मूल्य से फर्म के निर्गत से गुणा करके
ज्ञात किया जा सकता है अर्थात् कुल संप्राप्ति = वस्तु का बाजार मूल्य x फर्म का निर्गत
प्रश्न 31.
लाभ से आप क्या समझते हैं? यह कैसे ज्ञात किया
जाता है?
उत्तर:
एक फर्म द्वारा वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है जिस पर लगा खर्च
कुल लागत होती है तथा उसे बेचने से प्राप्त धन कुल संप्राप्ति कहलाती है, कुल संप्राप्ति तथा कुल लागत के अन्तर को लाभ कहा जाता है। इसे निम्न सूत्र
द्वारा ज्ञात किया जाता है। लाभ = कुल संप्राप्ति - कुल लागत
प्रश्न 32.
सामान्य लाभ तथा अधिसामान्य लाभ में अन्तर बताइए।
उत्तर:
ऐसा लाभ स्तर जो केवल स्पष्ट लागतों तथा अवसर लागतों को पूरा करता
है, वह सामान्य लाभ कहलाता है अर्थात् जहाँ कुल संप्राप्ति,
कुल लागत के बराबर होती है वह सामान्य लाभ कहलाता है। जबकि वह लाभ
जो एक फर्म सामान्य लाभ से ऊपर अर्जित करती है, अधिसामान्य
लाभ कहलाता है।
प्रश्न 33.
"पूर्ण प्रतिस्पर्धा में फर्म कीमत स्वीकारक होती है न कि कीमत
निर्धारक।" इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता में मूल्य का सम्बन्ध किसी फर्म विशेष से न होकर
सम्पूर्ण उद्योग से होता है तथा वस्तु की कीमत उस बिन्दु पर निर्धारित होती है जिस
पर उद्योग की वस्तु की कुल माँग और कुल पूर्ति बराबर होती है। इस बिन्दु पर स्थित
मूल्य साम्य मूल्य कहलाता है। प्रत्येक फर्म इसी साम्य मूल्य पर वस्तुओं का विक्रय
करती
प्रश्न 34.
पूर्ण प्रतिस्पर्धात्मक बाजार में एक फर्म बाजार कीमत से अधिक कीमत
नहीं ले सकती है। इसका क्या कारण है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में एक फर्म कीमत स्वीकारक होती है न कि कीमत
निर्धारक । इस बाजार में कीमत वहाँ पर निर्धारित होती है जहाँ पर बाजार में वस्तु
की मांग तथा पूर्ति बराबर होती है। यदि कोई फर्म अपनी कीमत को बाजार कीमत से अधिक
रखती है तो वह फर्म अपनी वस्तु का विक्रय नहीं कर सकती है।
प्रश्न 35.
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में एक फर्म के लाभ अधिकतमीकरण की शर्तों को
स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म के लाभ अधिकतमीकरण हेतु निम्न तीन
शर्ते पूरी होनी चाहिए
1.
बाजार
कीमत, सीमांत लागत के बराबर है।
2.
सीमांत
लागत हासमान नहीं होनी चाहिए।
3.
अल्पकाल
में, बाजार कीमत को औसत परिवर्ती
लागत की तुलना में अधिक होना चाहिए। दीर्घकाल में बाजार कीमत को औसत लागत की तुलना
में अधिक होना चाहिए।
प्रश्न 36.
पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म के साम्य निर्धारण की सीमान्त आगम तथा
सीमान्त लागत रीति की शर्ते बताइए।
उत्तर:
1.
साम्य
बिन्दु पर फर्म की सीमान्त आगम तथा सीमान्त लागत दोनों एक-दूसरे के बराबर होनी
चाहिए अर्थात् MR = MC हो।
2.
साम्य
बिन्दु पर फर्म का सीमान्त लागत वक्र उसके सीमान्त आगम वक्र को नीचे की ओर से
काटता हुआ ऊपर की ओर बढ़ना चाहिए।
प्रश्न 37.
यदि पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में एक वस्तु की कीमत 20 रु. प्रति इकाई है, तो दी हुई सारणी में कुल
सम्प्राप्ति एवं सीमान्त सम्प्राप्ति अनुसूचियों की गणना कीजिए।
|
बेची
गई |
कुल
संप्राप्ति |
सीमान्त
संप्राप्ति |
|
0 1 2 3 |
|
|
उत्तर:
|
बेची
गई |
कुल
संप्राप्ति |
सीमान्त
संप्राप्ति |
|
0 1 2 3 |
0 20 40 60 |
0 20 20 20 |
प्रश्न 38.
दो फर्मों वाले एक बाजार को लीजिए। निम्न तालिका दोनों फर्मों की
पूर्ति सारणियों को दर्शाती है, SS1 कॉलम
में फर्म 1 की पूर्ति सारणी, कॉलम SS2 में फर्म - 2 की पूर्ति सारणी है। बाजार पूर्ति
सारणी की गणना कीजिए।
|
कीमत |
इकाई
SS1 |
इकाई
SS2 |
|
0 1 2 3 4 5 6 |
0 2 4 6 8 10 12 |
0 1 2 3 4 5 6 |
उत्तर:
|
कीमत |
इकाई
SS1 |
इकाई
SS2 |
बाजार
निर्गत |
|
0 1 2 3 4 5 6 |
0 2 4 6 8 10 12 |
0 1 2 3 4 5 6 |
0 + 0 =0 1 + 2 = 3 4 + 2 = 6 6 + 3 = 9 8 + 4 = 12 10 + 5 = 15 12 + 6 = 18 |
निबन्धात्मक प्रश्न:
प्रश्न 1.
पूर्ण प्रतियोगिता क्या है? पूर्ण प्रतियोगिता
बाजार की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।
अथवा
पूर्ण प्रतियोगिता बाजार का अर्थ और विशेषताएँ लिखिए।
अथवा
पूर्ण प्रतियोगिता से आप क्या समझते हैं? पूर्ण
प्रतियोगिता बाजार की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता: पूर्ण प्रतियोगिता
बाजार की वह दशा होती है, जिसमें किसी वस्तु के अत्यधिक
क्रेता तथा विक्रेता बाजार में उपस्थित रहते हैं तथा बाजार में सभी विक्रेता समान
अथवा समरूप वस्तुओं का उत्पादन करते हैं। पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में अत्यधिक
उत्पादक होने से एक फर्म का वस्तु की पूर्ति में नगण्य भाग होता है।
एक फर्म वस्तु की पूर्ति को कम या अधिक करके मूल्यों को प्रभावित
करने की स्थिति में नहीं होती है। इस बाजार में वस्तु का मूल्य बाजार की माँग तथा
पूर्ति की दशाओं द्वारा निर्धारित करता है। इस बाजार में फर्म कीमत स्वीकारक होती
है तथा उद्योग द्वारा कीमत निर्धारित होती है। पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत समान
होती है तथा फर्म का माँग वक्र पूर्णतया लोचदार होता है। इस प्रकार के बाजार में
माँग वक्र, औसत संप्राप्ति वक्र तथा सीमान्त संप्राप्ति चक्र
एक समान क्षैतिज अक्ष के समानान्तर रेखा होती है।
पूर्ण प्रतियोगिता बाजार की विशेषताएँ-पूर्ण प्रतियोगिता वाले बाजार
की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार होती हैं।
1.
बाजार
में क्रेताओं तथा विक्रेताओं की अत्यधिक संख्या होती है अर्थात् बाजार में अनेक
क्रेता तथा विक्रेता होते हैं।
2.
बाजार
में सभी फर्म एक विशिष्ट समरूप वस्तु का उत्पादन करती हैं।
3.
पूर्ण
प्रतियोगिता बाजार में वस्तु की कीमतें समान होती हैं तथा बाजार में प्रत्येक
खरीददार और विक्रेता को कीमतों की जानकारी होती है तथा सभी को कीमत स्वीकारक होती
है।
4.
पूर्ण
प्रतियोगिता बाजार में बाजार कीमत पर विक्रेता चाहे जितनी वस्तु बेच सकता है तथा
क्रेता चाहे जितनी वस्तु खरीद सकता है।
5.
विक्रेताओं
तथा क्रेताओं को बाजार दशाओं का पूर्ण ज्ञान होता है।
6.
पूर्ण
प्रतिस्पर्धा बाजार में फर्मों के प्रवेश तथा बहिर्गमन की स्वतन्त्रता होती है।
7.
पूर्ण
प्रतिस्पर्धात्मक बाजार में साधनों में पूर्ण गतिशीलता पाई जाती है।
8.
पूर्ण
प्रतियोगिता में वस्तु की कीमत का निर्धारण बाजार की माँग तथा पूर्ति की शक्तियों
के द्वारा होता है।

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